काशी में हो रहे कौन-से परिवर्तन बिस्मिल्ला खाँ को व्यथित करते थे?
काशी में हो रहे उन परिवर्तनों से बिस्मिल्ला खाँ अत्यंत व्यथित होते थे, जिनमें संगीत, साहित्य और अदब की बहुत सारी परंपराएँ लुप्त हो गईं। जिस प्रकार काशी-पक्का महाल से मलाई बरफ़ गई, वैसे ही इन परंपराओं का लोप हुआ।
एक सच्चे सुर साधक और सामाजिक व्यक्ति की भाँति बिस्मिल्ला खाँ को इन परंपराओं की कमी खलती थी। काशी की उस गंगा-जमुनी संस्कृति का ह्रास, जहाँ मुहर्रम-ताजिया और होली-अबीर, गुलाल एक-दूसरे के पूरक थे, उन्हें गहरी पीड़ा देता था। उन्हें इस बात का दुख था कि काशी की यह विशिष्ट तहजीब और सांस्कृतिक धरोहर धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है।
Explanation
The textbook context highlights that Bismillah Khan was deeply pained by the fading cultural heritage of Kashi. Just as the essence of Kashi-Pakka Mahal melted away, the rich traditions of music, literature, and respect (adab) were disappearing. As a true musician and social being, the loss of this composite Ganga-Jamuni culture, where Hindu and Muslim customs beautifully complemented each other, deeply hurt him.