क्या राजा को प्रायश्चित करने के बाद सिंहासन पर बैठने का अधिकार मिलना चाहिए था? अपने उत्तर का कारण भी बताइए।
नहीं, राजा को प्रायश्चित करने के बाद भी सिंहासन पर बैठने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए था।
यह सिंहासन राजा विक्रमादित्य का था, जो अपने न्याय और विवेक के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। इस सिंहासन पर बैठने के लिए केवल शरीर से प्रायश्चित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मन की पूर्ण पवित्रता आवश्यक है।
राजा ने अपनी नाराजगी में एक दरबारी की जमीन पर कब्जा किया था, मुसीबत से बचने के लिए कई बार झूठ बोला था और दूसरों को चोट भी पहुँचाई थी। उसने तीन-तीन दिन तक उपवास और पूजा-पाठ करके प्रायश्चित्त तो किया, लेकिन उसके मन में अभी भी अहंकार का भाव बना रहा।
चौथी मूर्ति ने स्पष्ट रूप से कहा था कि जो लड़के इस सिंहासन पर बैठते थे, वे भोले-भाले थे और उनके मन में कोई कलुष नहीं था। इसके विपरीत, राजा के मन में अभी भी यह गुरूर था कि वह राजा है और उससे ज्यादा धनवान, बलवान और बुद्धिमान कोई नहीं है।
इसलिए, बिना मन की शुद्धि और अहंकार को त्यागे केवल उपवास करने से राजा उस सिंहासन पर बैठने का अधिकारी नहीं बन सकता था। उसे अपने भीतर की गलतियों और अहंकार को पूरी तरह समाप्त करना आवश्यक था।
Explanation
The question tests the student's critical thinking and understanding of the story's moral. The throne of King Vikramaditya demands a pure heart free from malice, which mere physical penance cannot achieve. The king's internal monologue reveals his lingering pride and ego, contrasting with the innocent boys, proving him unworthy despite his penance.